दालिया का अपूर्ण फेलुका समर्पण
फेलुका की झूलन के नीचे, उसका समर्पण छिपी गहराइयों को खोल देता है।
फेलुक्का की छायादार हार: दालिया का नाइल भेद
एपिसोड 4
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फेलुका लंगर पर हल्के से झूल रही थी, दोपहर की धूप लक्सोर के खंडहरों से परे नाइल की सतह को पिघले सोने की तरह चमका रही थी, पानी की सुस्त लहरें हर चमक और झिलमिलाहट को पकड़ रही थीं, मानो नदी खुद गहराइयों से ऊपर आ रही प्राचीन रहस्यों से भरी हुई हो। हवा में ऊपर घूमते आईबिस पक्षियों की दूर की आवाज गूंज रही थी, उनकी चीखें भारी, धूप से भुनी हुई खामोशी के खिलाफ तेज, जबकि पपीरस से घिरे किनारों से कमल के फूलों की हल्की खुशबू मिट्टी और पानी की मिट्टी वाली गंध के साथ मिल रही थी। दालिया रेलिंग पर खड़ी थी, उसके ठंडे राख ग्रे बाल हवा में बिखरे बनावटी लहरों में नाच रहे थे जो भूले हुए अगरबत्ती के धुएं की तरह लग रहे थे, जैतूनी भूरी त्वचा साधारण सफेद लिनेन सनड्रेस के खिलाफ चमक रही थी जो उसके पतले शरीर से चिपकी हुई थी, कपड़ा इतना पतला कि उसके साथ सांस लेता प्रतीत हो रहा था, जगह-जगह पारदर्शी जहां रोशनी सही पड़ रही थी, नीचे की सुंदर वक्रताओं का संकेत देते हुए। मैं उसे डेक के नीचे हैचवे से देख रहा था, दिल धड़क रहा था काहिरा से पाल रखे उस राज से, छाती में एक बोझ जो हर नजर से मरोड़ खा रहा था, आर्टिफैक्ट की परछाई मेरे दिमाग में फराओ के श्राप की तरह मंडरा रही थी, मुझे उसके तरफ खींचते हुए भले ही वो सब कुछ उलझा दे। मेरी नाड़ी कानों में गूंज रही थी, फेलुका की चरचराहट की गूंज, माथे पर पसीना टपक रहा था न सिर्फ लगातार गर्मी से बल्कि उस आग से जो उसने बिना बोले जला दी थी। वो मुड़ी, एम्बर ब्राउन आंखें मेरी आंखों से mysteriously गर्माहट के साथ जाकर टिक गईं, आधी मुस्कान वादा कर रही थी उस उलझन का जो हम दोनों पीछा...


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