फराह की छायादार पसंद
हवाएँ राज फुसफुसाती हैं जब इच्छा बढ़ते तूफान को टक्कर देती है।
कोहरे में चुनी फराह: जंगली समर्पण
एपिसोड 4
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नीचे त्योहार की रोशनी बिखरी हुई सितारों की तरह टिमटिमा रही थी, जो ऊबड़-खाबड़ हाइलैंड की ढलानों पर रंगों का खेल दिखा रही थी, मगर ऊपर इस हाइलैंड ओवरलुक पर सारी दुनिया बस उसमें सिमट गई थी—फराह यूसुफ, उसकी लंबी काली बाल आधे स्पेस बन्स में बंधे, बढ़ती हवा में बेतहाशा उड़ रहे थे, हवा में दूर के ड्रमों की थाप और जश्न की आग से उठता लकड़ी का तीखा धुआँ घुला हुआ था। ठंड मेरी त्वचा को काट रही थी, बाहों पर रोंगटे खड़े कर रही थी, फिर भी मेरा खून गरम दौड़ रहा था जब मैं उसे चढ़ते देख रहा था, हर कदम ऊपर के तूफानी बादलों के खिलाफ एक जानबूझकर की गई बगावत। उसने मेरे इशारे का पीछा किया था, जश्न की सबसे ज़्यादा अफरातफरी के बीच मुझे दुनिया के इस किनारे तक ढूँढ़ लिया, उसकी ज़िद ने मेरे अंदर कुछ जंगली-सा जगा दिया, वो रोमांच कि कोई मुझे ढूँढ़ रहा है बजाय मैं पीछा करूँ। मैं उसे आते देखता रहा, उसकी ऑलिव रंग की त्वचा चाँद की हल्की चाँदी रोशनी में चमक रही थी, उसके गालों की नरम लकीरें और कॉलरबोन का नाज़ुक उभार साफ़ दिख रहा था, हेज़ल आँखें मेरी आँखों में उस सपनों भरी तीखी नज़र से गड़ी हुई थीं जो मुझे हमेशा तोड़ देती थीं, उन लालसाओं के धागे खींच रही थीं जिन्हें मैं खानाबदोश एकांत में दबाए बैठा था। उसके चलने में कुछ रोमांटिक था, पतला बदन हवा के झोंकों को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था जैसे जहाज़ लहरें फाड़ता हो, उसकी सादी त्योहारी ड्रेस उसके पाँच फुट छह इंच के जिस्म को चिपकी हुई थी, पतला कपड़ा फड़फड़ा रहा था और बीच हवा हमें दोनों को खींच रही थी जब फ़राह करीब आ गई, उसकी हेज़ल आँखें मेरी आँखों में टटोल रही थीं, त्योहार वाली घाटी से ऊपर आती धुंधली...


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