धुंध में फराह की ठहरती नजर
अस्सी की धुंध में, एक नरम स्पर्श ने वर्जित आग भड़का दी।
कोहरे के घूंघट हटे: फराह की खामोश पूजा
एपिसोड 1
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खेतों से घना कोहरा लुढ़कता हुआ आ गया, ठंडा-नम चादर की तरह जो गीली घास की मिट्टी वाली खट्टी खुशबू और दूर की बारिश की सोंधी महक लिए हुए था, घोड़े के आंगन को लपेटते हुए जब फराह घोड़े से उतरी—वो सहज सुंदरता से उतरी जैसे उसके लिए सवारी जन्मजात हो। उसकी सिल्हूट डूबते सूरज के खिलाफ अप्सरा-सी खड़ी लग रही थी, आखिरी लाल-स्वर्ण किरणें उसके बदन को मुलायम चमकदार किनारों से रंग रही थीं, उसे देखकर लगता था जैसे कोई दूसरी दुनिया का नजारा हो। मैं अस्तबल की छाया से उसे निहार रहा था, दिल की धड़कन तेज हो गई, मेरे रूखे हाथ अभी भी वही सैडल पकड़े थे जिसे वो छोड़ गई थी, उसे इतने लाड़ से चमका रहा था कि मेरे ख्याल झलक रहे थे—वो ख्याल जो इन लंबी-उजाड़ शामों में उसके इर्द-गिर्द अनगिनत बार भटक चुके थे। चमड़े में अभी भी उसके बदन की गर्मी बाकी थी, उसकी परफ्यूम की हल्की-सी मदहोश करने वाली महक घुली हुई—चमेली और कुछ जंगलीपन का मेल, जैसे वो खुले खेत जिन्हें वो घोड़े पर फतह करना पसंद करती। मेरी उंगलियाँ सीवों पर धीरे-धीरे, पूजा की तरह सरक रही थीं, मानो सैडल छूकर मैं उसके और करीब आ जाऊं, उस फराह के पास, जिसने बिना जाने मेरी हर छिपी हुई तमन्ना को जकड़ लिया था। उसकी हेज़ल आँखें, जो ढलते उजाले में सोने की चमक से सजी हुई थीं, धुंधले पड़ते आंगन के पार मेरी नज़रों को पकड़ लीं, ज़रूरत से ज़्यादा देर तक टिके रहकर, उनकी गहराइयों में चमकता एक मौन सवाल जो मेरी साँस को अटका गया। क्या ये जिज्ञासा थी? वो लालसा जो मैं इतनी कोशिशों से छुपाने की कोशिश करता था, उसकी पहचान? या कुछ और गहरा, जो महीनों की चुराई नज़रों से मुझमें जमा दर्द को आईना दिखा रहा था? हमारे बीच की हवा भारी हो...


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