एस्थर की ठहरती निगाह
चमड़े-बंधी किताबों की खामोशी में, एक नजर ने हमें दोनों को बिखेर दिया।
एस्थर का अंकारा सिंहासन: रानी की लालसा का धमाका
एपिसोड 1
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मेरे परिवार के महल के विशाल लाइब्रेरी ने हमेशा मेरा आश्रय रहा था, एक विशाल कक्ष जहाँ सदियों का बोझ हल्के से गहरे लकड़ी के शेल्फों पर दबा था, जो चमड़े-बंधी किताबों से भरे थे जो अतीत के राज़ फुसफुसाते थे। उस शाम, जब सांझ ऊँचे मेहराब वाले खिड़कियों से गहराते नीले रंगों में छनकर आई, फारसी कालीनों पर लंबी परछाइयाँ डालती हुई, तो एस्थर का लाइब्रेरी में घूमने का अंदाज़ ऐसा था कि वो मुझे अपनी आर्मचेयर से चुंबक की तरह खींच ले गया। उसकी मौजूदगी ने सन्नाटे को चूर-चूर कर दिया, उसके कदम पॉलिश्ड ओक फ्लोरबोर्ड्स पर हल्के मगर जानबूझकर, हर कदम इस खामोश फैलाव में हल्का गूंजता। वो अपनी निजी सफाई शिफ्ट के लिए आई थी, महल हमारे आसपास खामोश था सिवाय दूर कहीं एंटीक घड़ी की टिक-टिक के, एक फिटेड अंकारा प्रिंट ड्रेस में जो उसके स्लिम फ्रेम को चिपककर हर कर्व को उभार रही थी—कमर की संकरी टेपरिंग, कूल्हों का हल्का फ्लेयर, टांगों की लंबी खूबसूरती। वो चटक रंगीन कपड़ा, जले हुए ओकर और मिडनाइट ब्लू के घुमावदार पैटर्न से भरा, उसके हर हलचल के साथ नाचता-सा लग रहा था, कमरे में बिखरी पीतल की लैंपों की गर्म चमक को पकड़ता। जब वो ऊँचे शेल्फों की ओर पहुँची, प्राचीन किताबों को एलिगेंट सटीकता से झाड़ रही थी, उसकी फेदर डस्टर पीढ़ियों के हाथों से चिकनी हुई रीढ़ों पर सरक रही थी, उसके लंबे काले ब्रेड्स हर कदम के साथ हल्के झूलते, कंधों से रेशमी पेंडुलम की तरह रगड़ते। मैं देखता रहा, मंत्रमुग्ध, मेरी किताब गोद में भूली हुई, बूढ़े कागज की हल्की खुशबू अब उसके पीछे लगे हल्के जस्मीन से मिलकर भटक रही थी—एक खुशबू जो पिछली शिफ्ट्स में मेरे दिमाग को सताती रही थी। उसके गहरे भूरे आँखें कमरे के पार मेरी नजर पकड़ लीं, वहाँ ठहरकर मद्धम रोशनी को चीरती हुईं। वो ठहरती...


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